अगर आप भी उन लाखों युवाओं में से एक हैं जो दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में नौकरी की तलाश में अपना समय और पैसा बर्बाद कर चुके हैं, तो यह खबर आपके लिए एक नई उम्मीद की किरण लेकर आई है। एक समय था जब अच्छी सैलरी और करियर ग्रोथ के लिए महानगरों की तरफ भागना ही एकमात्र रास्ता था, लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह से बदल चुकी है। आज भारत के टियर-2 और टियर-3 शहरों में नौकरियों की ऐसी बाढ़ आई है कि बड़े शहरों की चकाचौंध भी फीकी पड़ गई है। हाल के एक सर्वे ने तो मेरे जैसे एक्सपर्ट को भी चौंका दिया – भुवनेश्वर, उदयपुर और लखनऊ जैसे शहरों में पिछले एक साल में नौकरी के अवसरों में 40% से भी ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है!
इस लेख में, मैं आपको बताऊंगा कि यह बदलाव क्यों हो रहा है, इसके पीछे कौन से बड़े कारण हैं और सबसे महत्वपूर्ण, यह आपके करियर के लिए कितना फायदेमंद हो सकता है। मैं आपको अपने व्यक्तिगत अनुभव से बताऊंगा कि कैसे मैंने खुद इस ट्रेंड को करीब से देखा है और यह कैसे भारतीय जॉब मार्केट का भविष्य बन रहा है।
मेट्रो शहरों की चुनौती: भीड़, तनाव और खर्च
मैंने अपनी पत्रकारिता के शुरुआती दिनों में दिल्ली में काम किया है। मुझे याद है कि हर सुबह ट्रैफिक जाम में घंटों फंसा रहना, किराए के लिए आधी सैलरी खर्च कर देना और हर दिन काम के तनाव के साथ-साथ शहर के तनाव से भी जूझना पड़ता था। एक मेट्रो शहर में अच्छी सैलरी भी तब कम लगने लगती है जब आपकी कमाई का बड़ा हिस्सा रहने, खाने और आने-जाने पर खर्च हो जाता है। यही कारण है कि पिछले कुछ सालों में मेट्रो शहरों में काम करने वाले कई प्रोफेशनल्स ने बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस और कम खर्चीली जिंदगी की तलाश में छोटे शहरों का रुख किया है।
टियर-2 और टियर-3 शहरों में नौकरियों की बहार क्यों?
तो, सवाल यह है कि अचानक यह बदलाव क्यों आया? इसके पीछे तीन प्रमुख कारण हैं, जिन्हें मैंने अपने रिसर्च और इंडस्ट्री के लोगों से बातचीत के आधार पर समझा है।
1. हाइब्रिड और रिमोट वर्क कल्चर का उदय:
कोरोना महामारी ने हमें सिखाया कि काम करने के लिए ऑफिस में बैठना जरूरी नहीं है। बड़ी-बड़ी IT कंपनियां, कंसल्टिंग फर्म्स और यहां तक कि स्टार्टअप्स भी अब इस बात को मानते हैं कि क्वालिटी काम कहीं से भी किया जा सकता है। मेरे एक दोस्त, जो एक MNC में सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं, बताते हैं कि उनकी कंपनी ने दिल्ली का अपना बड़ा ऑफिस बंद करके कर्मचारियों को रिमोट काम करने की आजादी दे दी है। इसका सीधा फायदा यह हुआ कि अब कंपनियां छोटे शहरों से भी बेस्ट टैलेंट को हायर कर रही हैं, जिससे उनका ऑफिस इंफ्रास्ट्रक्चर का खर्च बच रहा है और कर्मचारियों को फ्लेक्सिबिलिटी मिल रही है।
2. सरकारी नीतियां और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर:
भारत सरकार ने ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘स्मार्ट सिटी’ जैसी पहलों के तहत टियर-2 और टियर-3 शहरों में इंटरनेट कनेक्टिविटी, सड़क और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं को मजबूत किया है। मैं खुद पिछले साल जयपुर में एक टेक कॉन्फ्रेंस में गया था और वहां की कनेक्टिविटी और हाई-टेक सुविधाओं को देखकर हैरान रह गया। बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर होने से अब कंपनियां भी इन शहरों में आसानी से अपना काम शुरू कर सकती हैं।
3. कम लागत में बेहतरीन टैलेंट:
एक और बड़ा कारण है ‘कॉस्ट-इफेक्टिव’ हायरिंग। मेट्रो शहरों में एक एम्प्लॉयी को हायर करने और उसे मेंटेन करने में कंपनियों का बहुत खर्च होता है। वहीं, टियर-2 शहरों में वे कम खर्च में ही उतना ही या उससे बेहतर टैलेंट ढूंढ सकती हैं। यह एक विन-विन सिचुएशन है – कंपनी का खर्च बचता है और स्थानीय युवाओं को अपने घर के पास ही अच्छी सैलरी वाली नौकरी मिल जाती है।
मेरे व्यक्तिगत अनुभव और ऑब्ज़र्वेशन
मुझे याद है, कुछ साल पहले मैं एक रिपोर्टिंग के सिलसिले में भुवनेश्वर गया था। उस समय भी मैं सोचता था कि यह एक शांत शहर है, लेकिन जब मैं हाल ही में फिर से वहां गया तो मैंने देखा कि कैसे एक शांत शहर एक उभरते हुए IT हब में बदल गया है। वहां कई स्टार्टअप्स अपने ऑफिस खोल रहे हैं और छोटे-छोटे को-वर्किंग स्पेस में युवाओं की भीड़ लगी है। यह सिर्फ भुवनेश्वर की कहानी नहीं है, यही हाल पुणे, चंडीगढ़, अहमदाबाद और यहां तक कि कोच्चि जैसे शहरों का भी है। ये शहर अब सिर्फ एजुकेशन हब नहीं रहे, बल्कि जॉब क्रिएशन के भी बड़े केंद्र बन गए हैं।
मैं कई HR मैनेजर्स और रिक्रूटर्स से भी मिला हूँ और उनका कहना है कि अब वे सिर्फ लोकेशन नहीं, बल्कि सही स्किल सेट को प्राथमिकता दे रहे हैं। उनके लिए यह मायने नहीं रखता कि आप दिल्ली में बैठे हैं या लखनऊ में, बस आपके पास सही हुनर होना चाहिए।
यह समझना जरूरी है कि यह ट्रेंड सिर्फ टेक सेक्टर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मैन्युफैक्चरिंग, रिटेल, और यहां तक कि मीडिया इंडस्ट्री में भी फैल रहा है। आइए, इस बदलाव के फायदे और नुकसान पर एक नजर डालते हैं:
टियर-2 और टियर-3 शहरों में नौकरी के फायदे और नुकसान
| फायदे (Pros) | नुकसान (Cons) |
|---|---|
| बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस: कम ट्रैफिक और प्रदूषण। | कम विकल्प: अभी भी मेट्रो शहरों की तुलना में जॉब रोल्स और कंपनियों की संख्या कम है। |
| कम खर्च: रहने और खाने का खर्च काफी कम। | नेटवर्किंग की कमी: बड़े शहरों में होने वाले इंडस्ट्री इवेंट्स और सेमिनार अभी भी सीमित हैं। |
| परिवार के पास: अपनों के साथ रहने का मौका। | शुरुआती सैलरी: कुछ कंपनियों में शुरुआती सैलरी मेट्रो शहरों से थोड़ी कम हो सकती है। |
| तेजी से विकास: इन शहरों की अर्थव्यवस्था में तेजी से ग्रोथ। | इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी: कुछ शहरों में अभी भी मेट्रो सिटी जैसी आधुनिक सुविधाएं पूरी तरह से विकसित नहीं हैं। |