क्या आपने कभी सोचा है कि जिस पुल से आप रोज़ गुजरते हैं, जिस स्मार्टफोन पर आप यह आर्टिकल पढ़ रहे हैं, या जिस मेट्रो में आप सफर करते हैं, वो सब जादू से नहीं, बल्कि किसी के दिमाग की उपज हैं? वो दिमाग है एक इंजीनियर का। 15 सितंबर का दिन भारत के लिए सिर्फ एक छुट्टी नहीं, बल्कि उस महान दिमाग को सलाम करने का दिन है, जिसने आधुनिक भारत की नींव रखी। मैं बात कर रहा हूँ भारत रत्न सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की, एक ऐसे दूरदर्शी इंजीनियर, जिन्होंने न सिर्फ कृष्णा राजा सागर डैम जैसे अद्भुत निर्माण किए, बल्कि भारत के भविष्य की भी रूपरेखा तैयार की।
हर साल, इंजीनियर्स डे एक नई थीम के साथ आता है, जो हमें इंजीनियरिंग के बदलते परिदृश्य से परिचित कराती है। और इस साल, 2025 की थीम है “Deep Tech & Engineering Excellence: Driving India’s Techade” (डीप टेक और इंजीनियरिंग उत्कृष्टता: भारत के ‘टेककेड’ को चलाना)। यह थीम सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि एक घोषणा है कि भारत अब सिर्फ सॉफ्टवेयर और सेवाओं का हब नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया के लिए AI, रोबोटिक्स और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसी “डीप टेक” तकनीकों का निर्माता बनेगा। इस लेख में, हम सर विश्वेश्वरैया की विरासत को समझेंगे और जानेंगे कि कैसे आज के इंजीनियर ‘डीप टेक’ के ज़रिए भारत को अगले दशक में एक वैश्विक तकनीकी महाशक्ति बनाने में लगे हैं।
सर विश्वेश्वरैया: दूरदर्शिता की एक मिसाल
जब हम ‘इंजीनियरिंग एक्सीलेंस’ की बात करते हैं, तो सर एम. विश्वेश्वरैया से बेहतर कोई उदाहरण नहीं है। उन्होंने इंजीनियरिंग को सिर्फ एक नौकरी नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का एक साधन माना। मेरे लिए, उनका काम सिर्फ बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स तक सीमित नहीं था, बल्कि हर छोटे से छोटे पहलू में उनकी दूरदर्शिता झलकती थी।
- कृष्णा राजा सागर (KRS) डैम: मैसूर में बना यह डैम सिर्फ एक बांध नहीं था। यह उस समय एशिया का सबसे बड़ा जलाशय था, जिसने लाखों किसानों को जीवनदान दिया। उन्होंने जिस ‘ऑटोमेटिक वियर फ्लडगेट’ सिस्टम को पेटेंट किया था, वह एक तकनीकी चमत्कार था, जो बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के बाढ़ के पानी को नियंत्रित करता था।
- हैदराबाद का बाढ़ सुरक्षा तंत्र: 1908 में जब मुसी नदी की बाढ़ ने हैदराबाद में तबाही मचाई, तो विश्वेश्वरैया ने शहर के लिए एक ऐसा बाढ़ सुरक्षा तंत्र बनाया जो आज भी प्रभावी है। यह दिखाता है कि कैसे इंजीनियरिंग सिर्फ नया बनाने के बारे में नहीं, बल्कि पुरानी समस्याओं को स्थायी रूप से हल करने के बारे में भी है।
- मैसूर का आधुनिकीकरण: दीवान के रूप में, उन्होंने मैसूर को एक आधुनिक और औद्योगिक राज्य में बदल दिया। मैसूर साबुन फैक्ट्री, मैसूर आयरन एंड स्टील वर्क्स जैसे संस्थानों की स्थापना उनकी ही देन थी।
यह सब करने के लिए, उन्हें सिर्फ अपनी इंजीनियरिंग स्किल्स पर भरोसा नहीं था, बल्कि भविष्य को देखने की अद्भुत क्षमता भी थी। आज, जब हम भारत के ‘टेककेड’ की बात करते हैं, तो हमें उनकी इसी दूरदर्शिता से प्रेरणा मिलती है।
डीप टेक: भारत के ‘टेककेड’ की कुंजी
यह बात तो आप भी मानेंगे कि भारत ने आईटी और सर्विस सेक्टर में दुनिया को अपनी ताकत दिखाई है। लेकिन अब समय आ गया है कि हम इससे एक कदम आगे बढ़ें। ‘डीप टेक’ यही अगला कदम है। ‘डीप टेक’ उन तकनीकों को कहते हैं जो मूलभूत वैज्ञानिक या इंजीनियरिंग खोजों पर आधारित होती हैं और जिनमें किसी बड़े बदलाव या क्रांति लाने की क्षमता होती है।
मुझे हाल ही में कुछ भारतीय स्टार्टअप्स के बारे में जानने का मौका मिला जो ‘डीप टेक’ पर काम कर रहे हैं। इन कंपनियों का काम देखकर मैं कह सकता हूँ कि भारत का टेककेड सिर्फ एक सपना नहीं, बल्कि एक हकीकत बनने जा रहा है। ये स्टार्टअप्स कोई ऐप या वेबसाइट नहीं बना रहे हैं, बल्कि वो टेक्नोलॉजी बना रहे हैं जो भविष्य की दुनिया को चलाएगी।
- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और मशीन लर्निंग (ML): भारत में AI सिर्फ चैटबॉट्स तक सीमित नहीं है। हेल्थकेयर से लेकर खेती तक, भारतीय इंजीनियर AI का इस्तेमाल जटिल समस्याओं को सुलझाने में कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, कृषि क्षेत्र में AI-आधारित समाधान किसानों को मिट्टी की गुणवत्ता का विश्लेषण करने और फसल की पैदावार बढ़ाने में मदद कर रहे हैं।
- रोबोटिक्स और ऑटोमेशन: भारतीय इंजीनियर अब सिर्फ दूसरे देशों के लिए कोड नहीं लिख रहे, बल्कि अपने खुद के रोबोट बना रहे हैं। ये रोबोट विनिर्माण, लॉजिस्टिक्स और यहां तक कि सर्जरी जैसे क्षेत्रों में क्रांति ला रहे हैं।
- क्वांटम कंप्यूटिंग: यह शायद सबसे रोमांचक क्षेत्र है। जबकि क्वांटम कंप्यूटर अभी अपने शुरुआती चरण में हैं, भारत सरकार का ‘नेशनल क्वांटम मिशन’ इस दिशा में एक बड़ा कदम है। यह मिशन देश को क्वांटम टेक्नोलॉजी में आत्मनिर्भर बनाने का लक्ष्य रखता है, जिसका उपयोग आने वाले समय में दवाइयों के विकास, एन्क्रिप्शन और डेटा विश्लेषण में होगा।
- सेमीकंडक्टर और स्पेस-टेक: भारत ने अपने खुद के सेमीकंडक्टर बनाने की दिशा में भी मजबूत कदम उठाए हैं। इसके अलावा, स्पेस-टेक स्टार्टअप्स जैसे कि अग्निकुल कॉसमॉस और स्काईरूट एयरोस्पेस, भारत को अंतरिक्ष में एक नई पहचान दे रहे हैं।
इंजीनियरिंग उत्कृष्टता: सिर्फ टेक्निकल ज्ञान नहीं
‘डीप टेक’ को सफल बनाने के लिए सिर्फ तकनीकी ज्ञान काफी नहीं है। इसके लिए ‘इंजीनियरिंग एक्सीलेंस’ की भी जरूरत है। मेरे अनुभव में, इसका मतलब सिर्फ सही कोड लिखना या सही डिजाइन बनाना नहीं है। इसका मतलब है:
- समस्या-समाधान की मानसिकता: विश्वेश्वरैया की तरह, आज के इंजीनियरों को भी जटिल समस्याओं को पहचानना और उनका रचनात्मक समाधान खोजना होगा।
- दीर्घकालिक सोच: ‘डीप टेक’ रातों-रात सफल नहीं होता। इसमें सालों का रिसर्च और धैर्य चाहिए।
- बहु-विषयक दृष्टिकोण: क्वांटम कंप्यूटिंग या बायोटेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में सफलता के लिए इंजीनियरिंग, विज्ञान और गणित को एक साथ लाना होगा।
Part C: The Verdict (Conclusion)
इस इंजीनियर्स डे, जब हम सर एम. विश्वेश्वरैया की महान विरासत को याद करते हैं, तो हमें यह भी समझना होगा कि उनकी विरासत सिर्फ इतिहास की बात नहीं है, बल्कि हमारे भविष्य की नींव है। उनकी दूरदर्शिता और राष्ट्र-निर्माण की भावना आज के इंजीनियरों में जिंदा है, जो ‘डीप टेक’ के जरिए भारत को ‘टेककेड’ की ओर ले जा रहे हैं।
निष्कर्ष:
| फायदे (Pros) | नुकसान (Cons) |
|---|---|
| डीप टेक में निवेश: भारत सरकार और प्राइवेट प्लेयर्स दोनों का ‘डीप टेक’ में निवेश बढ़ रहा है, जो स्टार्टअप्स और रिसर्च को बढ़ावा देगा। | कौशल की कमी: ‘डीप टेक’ के लिए उच्च-स्तरीय विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है, और भारत में अभी भी इस क्षेत्र में कुशल पेशेवरों की कमी है। |
| वैश्विक प्रतिस्पर्धा: ‘डीप टेक’ में प्रगति भारत को वैश्विक तकनीकी बाजार में एक मजबूत दावेदार बनाएगी, जिससे आर्थिक विकास होगा। | ज्यादा लागत और जोखिम: ‘डीप टेक’ रिसर्च और डेवलपमेंट में बहुत अधिक लागत और समय लगता है, जिससे असफलता का जोखिम भी अधिक होता है। |
| आत्मनिर्भरता: स्वदेशी ‘डीप टेक’ समाधानों का विकास भारत को महत्वपूर्ण तकनीकों के लिए विदेशी निर्भरता से मुक्त करेगा। | नियामक और नैतिक चुनौतियां: AI और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसी प्रौद्योगिकियां नए कानूनी और नैतिक सवाल खड़े करती हैं, जिनके लिए उचित नियमों की आवश्यकता होगी। |
2025 का इंजीनियर्स डे एक महत्वपूर्ण मोड़ है। यह हमें याद दिलाता है कि हमारा इंजीनियरिंग समुदाय सिर्फ अतीत की उपलब्धियों पर ही गर्व नहीं कर सकता, बल्कि उसे भविष्य की चुनौतियों को भी स्वीकार करना होगा। मेरा मानना है कि ‘डीप टेक’ में भारत की क्षमता बेजोड़ है। अगर हम सही नीतियों, पर्याप्त निवेश और सबसे बढ़कर, विश्वेश्वरैया जैसी दूरदर्शिता के साथ आगे बढ़ते हैं, तो हम भारत को एक ‘टेक्नोलॉजी सुपरपावर’ बना सकते हैं।
तो इस इंजीनियर्स डे पर, अपने आसपास के हर इंजीनियर को सलाम करें। वे ही हैं जो कल के लिए रास्ता बना रहे हैं, एक ऐसा रास्ता जो हमें ‘टेककेड’ के शिखर तक ले जाएगा। और आप क्या सोचते हैं? क्या ‘डीप टेक’ वाकई भारत के भविष्य को बदल सकता है? नीचे कमेंट्स में अपनी राय जरूर बताएं!
