अगर आप भी सोचते हैं कि डिप्रेशन एक आम समस्या है, तो रुकिए! हाल ही में आई विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक चौंकाने वाली रिपोर्ट ने एक ऐसा सच उजागर किया है, जिसे सुनकर आपके होश उड़ जाएंगे। यह रिपोर्ट बताती है कि दुनिया भर में महिलाएँ, पुरुषों की तुलना में डिप्रेशन और एंग्जायटी से कहीं ज़्यादा पीड़ित हैं। जी हाँ, आपने सही सुना – कहीं ज़्यादा।
यह सिर्फ कोई आकस्मिक डेटा नहीं है, बल्कि एक गंभीर चेतावनी है। यह मानसिक स्वास्थ्य का अंतर सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में देखा गया है। सवाल यह है कि आखिर इसके पीछे क्या कारण है? क्या यह सिर्फ हार्मोनल बदलावों का नतीजा है, या इसके पीछे कुछ गहरे सामाजिक और आर्थिक कारण छिपे हैं? इस ब्लॉग पोस्ट में, मैं एक पत्रकार के रूप में आपके साथ एक गहरा विश्लेषण साझा करूँगा। हम देखेंगे कि विज्ञान, समाज और रोज़मर्रा की जिंदगी कैसे महिलाओं को मानसिक बीमारियों के इस दलदल में धकेल रही है।
1. जैविक और हार्मोनल कारण: क्या प्रकृति ही वजह है?
जब मैंने इस विषय पर शोध करना शुरू किया, तो पहला सवाल जो मेरे दिमाग में आया वो था, “क्या यह सिर्फ हार्मोन का खेल है?” और इसका जवाब है – हाँ, काफी हद तक। महिलाएँ जीवन भर कई हार्मोनल बदलावों से गुज़रती हैं, जो पुरुषों के लिए अज्ञात हैं।
- मासिक धर्म चक्र (Menstrual Cycle): मासिक धर्म से पहले, कई महिलाओं में प्रीमेंस्ट्रुअल डिस्फोरिक डिसऑर्डर (PMDD) के लक्षण दिखाई देते हैं। यह सिर्फ मूड स्विंग नहीं है, बल्कि गंभीर डिप्रेशन, एंग्जायटी और चिड़चिड़ापन का एक रूप है जो हर महीने मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालता है।
- प्रेग्नेंसी और प्रसवोत्तर डिप्रेशन (Postpartum Depression): प्रेग्नेंसी के दौरान और उसके बाद, शरीर में हार्मोन का स्तर तेज़ी से ऊपर-नीचे होता है। एक नई माँ की खुशी के पीछे, पोस्टपार्टम डिप्रेशन का खतरा छिपा होता है, जो कई महिलाओं को गहरे अवसाद में धकेल देता है।
- मेनोपॉज़ (Menopause): यह जीवन का एक और चरण है जहाँ एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर अचानक गिरता है, जिससे न केवल शारीरिक, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है। मेनोपॉज़ के दौरान डिप्रेशन और एंग्जायटी के मामले बेहद आम हैं।
2. सामाजिक और सांस्कृतिक दबाव: समाज का अदृश्य बोझ
मैं कई सालों से इस विषय पर लिख रहा हूँ और मैंने देखा है कि जैविक कारणों से भी ज़्यादा, समाज का दबाव एक बड़ा कारण है। भारत जैसे देशों में, एक महिला पर कई तरह की उम्मीदें थोपी जाती हैं।
- दोहरी ज़िम्मेदारी (Dual Responsibility): एक तरफ करियर की दौड़, तो दूसरी तरफ घर और परिवार की ज़िम्मेदारी। मैंने ऐसी कई महिलाओं से बात की है जो ऑफिस में बॉस की डांट और घर में बच्चों की फरमाइशों के बीच पिस रही हैं। यह दोहरी ज़िम्मेदारी लगातार तनाव और एंग्जायटी का कारण बनती है।
- भेदभाव और असमानता (Discrimination & Inequality): वर्कप्लेस में वेतन से लेकर प्रमोशन तक, भेदभाव एक कड़वा सच है। इस तरह के अनुभव आत्मविश्वास को बुरी तरह से प्रभावित करते हैं और धीरे-धीरे डिप्रेशन का रूप ले लेते हैं।
- भावनात्मक बोझ (Emotional Burden): भारतीय समाज में अक्सर यह उम्मीद की जाती है कि महिलाएँ “मजबूत” होंगी और “संभाल लेंगी।” उन्हें अपनी भावनाओं को दबाने की सलाह दी जाती है, जिससे मानसिक बोझ और बढ़ जाता है।
3. आर्थिक स्वतंत्रता और वित्तीय असुरक्षा
WHO की रिपोर्ट बताती है कि आर्थिक असमानता भी एक बड़ा कारण है। एक महिला जो आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं है, उसके पास अपने जीवन के फैसले लेने की आज़ादी कम होती है। यह स्थिति helplessness (निस्सहायता) की भावना पैदा करती है, जो डिप्रेशन का एक सीधा कारण है। मैंने अपने शोध में पाया है कि आर्थिक स्वतंत्रता हासिल करने वाली महिलाएँ ज़्यादा आत्मविश्वासी और मानसिक रूप से मजबूत होती हैं।
मेरा निष्कर्ष: यह समय बदलाव का है
इतने सारे डेटा और अनुभवों को देखने के बाद, मैं एक बात पूरे यकीन के साथ कह सकता हूँ कि महिलाओं में डिप्रेशन और एंग्जायटी की समस्या सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे समाज की है। यह सिर्फ हार्मोन का खेल नहीं है, बल्कि उस माहौल का नतीजा है जिसमें हम रहते हैं।
महिलाओं के लिए सुझाव:
- खुले दिल से बात करें: अपनी भावनाओं को दबाएँ नहीं। अपने दोस्तों या परिवार के किसी भरोसेमंद सदस्य से बात करें।
- पेशेवर मदद लें: मानसिक स्वास्थ्य की समस्या कोई शर्म की बात नहीं है। एक थेरेपिस्ट या काउंसलर से बात करने में हिचकिचाएँ नहीं।
- खुद को प्राथमिकता दें: अपनी हॉबीज़ के लिए समय निकालें, अपनी सेहत का ध्यान रखें और “ना” कहना सीखें।
समाज के लिए सुझाव:
- मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करें: डिप्रेशन और एंग्जायटी को एक बीमारी मानें, न कि कमज़ोरी।
- घर की ज़िम्मेदारियाँ बाटें: घर के काम सिर्फ महिलाओं की ज़िम्मेदारी नहीं हैं। उन्हें पुरुषों के साथ मिलकर बांटना ज़रूरी है।
- समानता को बढ़ावा दें: कार्यस्थल और समाज में महिलाओं के लिए समान अवसर सुनिश्चित करें।
